उत्तर प्रदेश के बिजनौर जिले के एक गांव में इंसानियत और आपसी भाईचारे की ऐसी तस्वीर सामने आई है, जिसने लोगों का ध्यान खींचा है। रामलीला की तैयारियां पूरी थीं, कलाकार मंचन के लिए तैयार थे, लेकिन गांव की एक बुजुर्ग मुस्लिम महिला के निधन की खबर मिलते ही आयोजन स्थगित कर दिया गया। आखिर गफूरन बुआ से गांव के लोगों का ऐसा क्या रिश्ता था, जिसके चलते उत्सव से पहले उनके दुख को महत्व दिया गया? आगे पढ़ें पूरी खबर।

बिजनौर के मोहड़ा गांव में सामने आई भाईचारे की मिसाल
उत्तर प्रदेश के बिजनौर जिले की धामपुर तहसील के मोहड़ा गांव में हिंदू-मुस्लिम एकता और आपसी सद्भाव की एक भावुक कर देने वाली मिसाल देखने को मिली। यहां एक बुजुर्ग मुस्लिम महिला के निधन के बाद गांव में होने वाली रामलीला का मंचन स्थगित कर दिया गया।
गांव की रहने वाली गफूरन को लोग प्यार से ‘बुआ’ कहकर बुलाते थे। उनका गांव के लोगों से गहरा अपनापन था। यही वजह रही कि उनके निधन की खबर से पूरे गांव में शोक का माहौल छा गया।
रामलीला की तैयारियां पूरी थीं, फिर क्यों टला आयोजन?
मोहड़ा गांव में रामलीला का मंचन शुरू होने वाला था। आयोजन को लेकर तैयारियां पूरी थीं और कलाकार भी मंचन के लिए तैयार थे। इसी बीच 10 अक्टूबर को करीब 85 वर्षीय गफूरन का निधन हो गया।
उनके निधन की खबर गांव पहुंची तो रामलीला कमेटी के सदस्यों ने आपसी सहमति से कार्यक्रम स्थगित करने का फैसला लिया। ग्रामीणों का मानना था कि जब गांव की अपनी बुआ का निधन हुआ है, तो ऐसे दुख के माहौल में उत्सव मनाना उचित नहीं होगा।
इस फैसले के पीछे किसी तरह का दबाव नहीं, बल्कि गफूरन के प्रति सम्मान और गांव के लोगों का भावनात्मक जुड़ाव था।
‘गफूरन बुआ’ से पूरे गांव का था खास रिश्ता
गांव के प्रधान और रामलीला कमेटी से जुड़े ऋषिपाल सिंह के मुताबिक, गफूरन गांव के लोगों के लिए परिवार की सदस्य जैसी थीं। उनका कहना था कि जब गांव में उनकी बुआ समान महिला का जनाजा रखा हो, तो उसी समय रामलीला करना उन्हें उचित नहीं लगा।
गफूरन गांव के लोगों से आत्मीयता से मिलती थीं। स्थानीय लोगों के मुताबिक, वह गांव के छोटे-बड़े लोगों को पहचानती थीं और सभी के साथ स्नेह का रिश्ता रखती थीं।
गफूरन के अंतिम संस्कार में भी शामिल हुए गांव के लोग
गफूरन के बेटे जाकिर हुसैन ने बताया कि उनकी मां की तबीयत 10 अक्टूबर को बिगड़ी थी और उसी दिन उनका निधन हो गया। उन्होंने कहा कि गांव में रामलीला की तैयारियां चल रही थीं, लेकिन मां के निधन के बाद मंचन टाल दिया गया।
जाकिर के मुताबिक, उनकी मां उन्हें हिंदू भाइयों के साथ मेलजोल और आपसी रिश्ते बनाए रखने की सीख देती थीं। गफूरन के जनाजे में गांव के कई हिंदू लोग भी शामिल हुए और परिवार के प्रति संवेदना जताई।
धर्म से ऊपर उठकर निभाया इंसानियत का रिश्ता
मोहड़ा गांव की इस घटना ने एक बार फिर दिखाया कि आपसी रिश्ते और संवेदनाएं धर्म की सीमाओं से ऊपर हो सकती हैं। रामलीला गांव की धार्मिक और सांस्कृतिक परंपरा का हिस्सा है, लेकिन ग्रामीणों ने एक बुजुर्ग महिला के निधन पर शोक और सम्मान को प्राथमिकता दी।
गांव के लोगों का यह कदम बताता है कि भाईचारा केवल बातों से नहीं, बल्कि एक-दूसरे के सुख-दुख में साथ खड़े होने से मजबूत होता है।
मोहड़ा गांव की यह कहानी एक संदेश देती है—इंसानियत और आपसी सम्मान ही समाज को जोड़कर रखते हैं।





