शूटर ताई – जिनके नाम पर फिल्म भी बनी और इतिहास भी

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संसार क्रान्ति (नवीन नरवाना): भारत की बात करें तो आज से 20-30 साल पहले ये भारत आज के भारत के काफी अलग था. यहाँ औरत (महिलाओं) को घर में काम करने वाली मशीन समझा जाता था. महिलाएँ केवल घर और खेत तक सीमित थी. अगर आज के जमाने से बीतें हुए कल की तुलना करें तो काफी बदलाव आया हैं हमारी संस्कृति में.

बात उत्तरप्रदेश की हैं जहां रहने वाली 2 ताइयों ने अपनी लड़कियों को आगे बढ़ाने और नौकरी दिलाने के लिए शूटिंग शुरू कर दी थी. एक ताई का नाम प्रकाशी तोमर और दूसरी का नाम चन्द्रो तोमर जिन्होंने 65 साल की उम्र में अपने हाथों में पिस्तौल उठाई. (इन्हें शूटर दादी के नाम से जाना जाता हैं) दरअसल 1999 में चन्द्रो ताई ने अपनी पोती शेफाली तोमर को शूटिंग सिखाना शुरू किया. ताई ने पोती Shefali Tomar का दाखिला जौहड़ी राइफल क्लब में करा दिया. प्रकाशी ताई अपनी बेटी सीमा तोमर को शूटर बनाना चाहती थी.

ताई ने दाखिला तो करा दिया लेकिन यहाँ एक समस्या थी कि वो क्लब लड़कों का था. इसलिए पोती शेफाली वहाँ जाने से डरती थी. पोती को शूटिंग सिखानी थी तो ताई चन्द्रो पोती के साथ क्लब में जाने लगी. पहले दिन वहाँ पहुँचने पर शेफाली तोमर पिस्तौल में छर्रे नहीं डाल पाई थी. उसे सिखाने के लिए दादी चन्द्रो ने उसमें छर्रे डाले और लक्ष्य की तरफ देख कर निशाना लगा दिया. आपको बता दे उस वक्त चन्द्रो ताई ने एक के बाद एक कुल दस लक्ष्य भेदे. शूटिंग में उसे ‘बुल्सआई’ कहते हैं यानी की ‘सांड की आंख‘ (Saand Ki Aankh) उनपर हाल ही में एक फिल्म भी बनी हैं जिनका नाम सांड की आँख रखा गया हैं.

पहले बड़े बूढ़ों को सोच होती थी की लड़कियाँ/महिलाएँ घर का काम करें. उससे ऊपर उठकर दोनों बुजुर्ग महिलाओं ने ये साबित कर दिया तो शरीर बूढ़ा हो सकता हैं मगर मन नहीं. अब बात पर आते हैं दादी चन्द्रो के सटीक निशाना लगाने के बाद वहाँ हर कोई चौक गया था. कोच फारूक पठान ने चन्द्रो ताई को शूटर बनने की सलाह दी. मगर घर वालों की अनुमति ना मिलने के डर से ताई चन्द्रो राजी नहीं हुई. फिर वहाँ स्थित बच्चों ने ताई को शूटर बनने की हिम्मत दी और शुरू होग्या ताई का शूटर सफर.

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