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दिवाली से पहले किसानों के लिए बड़ी खबर!भारत को मिले सस्ते आयात के प्रस्ताव

रबी फसलों की बुवाई से पहले किसानों के लिए राहत भरी खबर सामने आई है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में यूरिया की कीमतों में नरमी आई है और भारत को अगस्त के मुकाबले करीब 10 प्रतिशत कम कीमत पर यूरिया आयात करने के प्रस्ताव मिले हैं। इससे देश में यूरिया की उपलब्धता बनाए रखने और सरकार के उर्वरक सब्सिडी खर्च को कम करने में मदद मिल सकती है। हालांकि, आयात की कीमतों में गिरावट का मतलब यह नहीं है कि किसानों को यूरिया की बोरी सीधे 10 प्रतिशत सस्ती मिलेगी। आखिर इस गिरावट की वजह क्या है और किसानों को इससे कैसे फायदा हो सकता है? आगे पढ़ें पूरी खबर।

यूरिया की कीमतों में क्यों आई गिरावट?

अंतरराष्ट्रीय बाजार में यूरिया की आपूर्ति बढ़ने से कीमतों पर दबाव कम हुआ है। कुछ समय पहले ब्राजील और मध्य पूर्व के बाजारों में कीमतें बढ़ने के संकेत मिले थे, लेकिन अब वैश्विक स्तर पर उपलब्धता में सुधार होने से भारतीय खरीदारों को अपेक्षाकृत कम कीमत पर यूरिया खरीदने के प्रस्ताव मिले हैं।

भारत अपनी कृषि जरूरतों को पूरा करने के लिए घरेलू उत्पादन के साथ-साथ विदेशों से भी यूरिया आयात करता है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय कीमतों में गिरावट देश की खाद आपूर्ति और सरकारी खर्च, दोनों के लिहाज से महत्वपूर्ण मानी जा रही है।

 

17 लाख टन यूरिया खरीदने के लिए जारी हुआ टेंडर

रबी सीजन से पहले सरकारी कंपनी इंडियन पोटाश लिमिटेड (IPL) ने 17 लाख टन यूरिया आयात करने के लिए टेंडर जारी किया था। इसमें पश्चिमी तट के लिए 10 लाख टन और पूर्वी तट के लिए 7 लाख टन यूरिया की खरीद शामिल थी।

इस टेंडर में पूर्वी तट के लिए सबसे कम बोली 352.10 डॉलर प्रति टन और पश्चिमी तट के लिए 356.25 डॉलर प्रति टन रही। वहीं, अगस्त में जारी टेंडर के दौरान शुरुआती कीमतें लगभग 390 से 394 डॉलर प्रति टन के आसपास थीं।

इन आंकड़ों के मुताबिक, नए टेंडर में यूरिया के आयात भाव में करीब 10 प्रतिशत की कमी देखने को मिली है।

 

जरूरत से तीन गुना से ज्यादा यूरिया की पेशकश

भारत को यूरिया की आपूर्ति के लिए अंतरराष्ट्रीय बाजार से अच्छी प्रतिक्रिया मिली है। IPL के 17 लाख टन के टेंडर के मुकाबले विभिन्न कंपनियों ने लगभग 53.5 लाख टन यूरिया की पेशकश की।

यह मात्रा मांगी गई जरूरत से तीन गुना से भी अधिक है। इससे संकेत मिलता है कि अंतरराष्ट्रीय आपूर्तिकर्ताओं के बीच भारतीय बाजार में यूरिया बेचने को लेकर प्रतिस्पर्धा बनी हुई है। ऐसी स्थिति में भारत को बेहतर कीमतों पर खाद खरीदने के अवसर मिल सकते हैं।

 

क्या किसानों को अब सस्ती मिलेगी यूरिया की बोरी?

यह सवाल किसानों के लिए सबसे महत्वपूर्ण है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में यूरिया के आयात भाव में गिरावट आने से किसानों को मिलने वाली यूरिया की बोरी की कीमत अपने आप 10 प्रतिशत कम नहीं हो जाती।

भारत में किसानों के लिए यूरिया की खुदरा कीमत सरकार नियंत्रित करती है। आयात की वास्तविक लागत और किसानों से वसूली जाने वाली कीमत के बीच का अंतर सरकार सब्सिडी के जरिए वहन करती है।

इसलिए यूरिया के आयात भाव कम होने का सीधा फायदा सरकार के उर्वरक सब्सिडी खर्च में राहत के रूप में सामने आ सकता है। किसानों को तत्काल सस्ती बोरी मिलने का दावा करना फिलहाल सही नहीं होगा।

 

भारत में हर साल कितनी यूरिया की जरूरत पड़ती है?

कृषि क्षेत्र में यूरिया का इस्तेमाल फसलों को नाइट्रोजन उपलब्ध कराने के लिए किया जाता है। गेहूं सहित कई रबी फसलों की अच्छी वृद्धि के लिए इसकी महत्वपूर्ण भूमिका होती है।

रसायन एवं उर्वरक मंत्रालय से जुड़े आंकड़ों के अनुसार, भारत को हर साल लगभग 400 लाख टन यूरिया की जरूरत पड़ती है। घरेलू उत्पादन के बावजूद इस मांग को पूरा करने के लिए आयात भी करना पड़ता है।

वित्त वर्ष 2025-26 में अप्रैल से जनवरी के बीच देश में 251.26 लाख टन यूरिया का उत्पादन हुआ, जबकि इसी अवधि में 89.30 लाख टन यूरिया का आयात किया गया था।

 

रबी फसलों की बुवाई से पहले क्यों अहम है यह खबर?

रबी सीजन में किसान गेहूं, सरसों, चना और अन्य फसलों की बुवाई करते हैं। इस दौरान समय पर खाद उपलब्ध होना बेहद जरूरी होता है। यूरिया के आयात भाव में कमी और खरीद के लिए पर्याप्त अंतरराष्ट्रीय प्रस्ताव मिलने से आपूर्ति बनाए रखने में मदद मिल सकती है।

हालांकि, किसानों को खाद समय पर मिलेगी या नहीं, यह केवल अंतरराष्ट्रीय कीमतों पर निर्भर नहीं करता। इसके लिए घरेलू उत्पादन, आयात की समय पर डिलीवरी, परिवहन और राज्यों में वितरण व्यवस्था भी महत्वपूर्ण है।

 

चीन की निर्यात नीति का भी पड़ा असर

अंतरराष्ट्रीय बाजार में यूरिया की उपलब्धता पर चीन की निर्यात नीति का भी असर पड़ता है। चीन अपनी घरेलू जरूरतों के अनुसार यूरिया के निर्यात को नियंत्रित करता है और परिस्थितियों के मुताबिक इसमें ढील भी देता है।

निर्यात के लिए उपलब्ध मात्रा बढ़ने से वैश्विक बाजार में आपूर्ति को सहारा मिल सकता है। इसके अलावा अन्य देशों से उपलब्धता और अंतरराष्ट्रीय मांग में बदलाव भी कीमतों को प्रभावित करते हैं।

 

सरकार को सब्सिडी खर्च में मिल सकती है राहत

यूरिया की वैश्विक कीमतों में गिरावट भारत सरकार के लिए भी महत्वपूर्ण है। जब आयात अपेक्षाकृत सस्ती दरों पर होता है, तो खाद की आपूर्ति बनाए रखने की लागत कम हो सकती है। इससे उर्वरक सब्सिडी के बजट पर दबाव घटने की संभावना रहती है।

फिलहाल इस खबर का मुख्य असर यूरिया की खरीद लागत और उपलब्धता पर दिखाई देता है। किसानों को खुदरा कीमत में कोई नई छूट मिलेगी या नहीं, इस बारे में अलग से आधिकारिक घोषणा जरूरी होगी।

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