संभल हिंसा मामले में सुप्रीम कोर्ट ने मुल्ला अफरोज की प्रिवेंटिव डिटेंशन यानी निवारक हिरासत को लेकर अहम फैसला सुनाया है। कोर्ट ने हिरासत के आदेश को रद्द करते हुए उत्तर प्रदेश सरकार पर 10 लाख रुपये की कॉस्ट लगाई है। मामला 2024 की संभल हिंसा से जुड़ा है।आगे पढ़ें पूरी खबर।

पुलिस हिरासत के कथित कबूलनामे पर उठे सवाल
सुप्रीम कोर्ट में मुख्य सवाल यह था कि क्या पुलिस हिरासत में दिए गए कथित कबूलनामे को आधार बनाकर राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम (NSA) के तहत किसी व्यक्ति को निवारक हिरासत में रखा जा सकता है।
कोर्ट ने इस आधार पर सरकार से सवाल किए और कथित कबूलनामे की कानूनी प्रासंगिकता पर विचार किया। इसके बाद कोर्ट ने मुल्ला अफरोज की हिरासत को चुनौती देने वाली याचिका पर फैसला सुनाया।
2024 की संभल हिंसा से जुड़ा है मामला
मुल्ला अफरोज को संभल की शाही जामा मस्जिद के सर्वे के दौरान नवंबर 2024 में हुई हिंसा के मामले में आरोपी बनाया गया था। उस हिंसा में चार लोगों की मौत हुई थी। बाद में उनके खिलाफ NSA के तहत निवारक हिरासत का आदेश जारी किया गया।
उपलब्ध रिपोर्ट के मुताबिक, अफरोज को 13 अक्टूबर 2025 को NSA की धारा 3(2) के तहत हिरासत में लिया गया था। इससे पहले इलाहाबाद हाईकोर्ट में उनकी हिरासत को चुनौती दी गई थी, लेकिन जून 2026 में हाईकोर्ट ने याचिका खारिज कर दी थी।
सुप्रीम कोर्ट में कैसे पहुंचा मामला?
इलाहाबाद हाईकोर्ट से राहत नहीं मिलने के बाद मुल्ला अफरोज ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया। मामले की सुनवाई जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागू की बेंच ने की।
8 सितंबर 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई पूरी करने के बाद फैसला सुरक्षित रखा था। उस दौरान भी कोर्ट ने पुलिस हिरासत में दिए गए कथित कबूलनामे को निवारक हिरासत का आधार बनाने को लेकर सवाल उठाए थे।
अब ₹10 लाख की कॉस्ट क्यों?
सुप्रीम कोर्ट के फैसले का अहम हिस्सा यह है कि अदालत ने हिरासत के मामले में यूपी सरकार पर 10 लाख रुपये की कॉस्ट लगाई है।
अदालत ने पुलिस हिरासत में दिए गए कथित कबूलनामे के आधार पर निवारक हिरासत के इस्तेमाल पर आपत्ति दर्ज की।
यह मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें NSA जैसी निवारक हिरासत की शक्ति और उसके इस्तेमाल के कानूनी आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने विचार किया है।




