साल 2016 के जाट आरक्षण आंदोलन से जुड़े मिंटू हत्याकांड में पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाया है। अदालत ने पवन उर्फ पोना समेत तीन लोगों की उम्रकैद की सजा रद्द करते हुए उन्हें बरी कर दिया। इस फैसले के साथ पवन की लंबी कानूनी लड़ाई में अहम मोड़ आया है। रिपोर्टों के मुताबिक, वह 10 साल से ज्यादा समय जेल में बिता चुका है। आखिर हाईकोर्ट ने निचली अदालत का फैसला क्यों पलटा और किन सबूतों पर उठे सवाल? आगे पढ़ें पूरी खबर।

जाट आरक्षण आंदोलन से जुड़ा है मामला
यह मामला फरवरी 2016 में हरियाणा में हुए जाट आरक्षण आंदोलन के दौरान हिसार के हांसी क्षेत्र में हुई हिंसा से जुड़ा है। अभियोजन पक्ष के मुताबिक, 22 फरवरी को धनी पाल क्षेत्र में शांति की ढाणी पर भीड़ ने हमला किया था। इस दौरान गोलीबारी हुई, जिसमें मिंटू और कृष्ण घायल हो गए थे। बाद में मिंटू की मौत हो गई।
इस मामले में दलजीत उर्फ जलजीत, पवन उर्फ पोना और सुरेंद्र उर्फ झंडा को आरोपी बनाया गया था। हिसार की निचली अदालत ने तीनों को हत्या सहित अन्य गंभीर आरोपों में दोषी ठहराते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई थी।
हाईकोर्ट ने क्यों रद्द की उम्रकैद की सजा?
पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट की खंडपीठ ने अपील पर सुनवाई करते हुए अभियोजन पक्ष के सबूतों पर गंभीर सवाल उठाए। अदालत ने पाया कि आरोपियों के खिलाफ अपराध को संदेह से परे साबित करने में अभियोजन पक्ष सफल नहीं रहा।
रिपोर्ट के अनुसार, घायल प्रत्यक्षदर्शियों और शिकायतकर्ता ने सुनवाई के दौरान आरोपियों के खिलाफ अभियोजन के मामले का समर्थन नहीं किया। कुछ गवाहों ने आरोपियों को हमलावर के रूप में पहचानने से भी इनकार कर दिया। इससे अभियोजन पक्ष के मामले पर असर पड़ा।
हथियार से जुड़े सबूतों पर भी उठे सवाल
मामले में मिंटू की हत्या से जोड़कर पेश किए गए हथियार की बरामदगी और उसे इस केस से जोड़ने की प्रक्रिया पर भी सवाल उठे। हाईकोर्ट ने पाया कि हथियार दूसरे मामले में बरामद हुआ था और उसे मिंटू हत्याकांड से जोड़ने में दो साल से अधिक की देरी हुई थी।
अदालत के सामने हथियार की खरीद और उसे दूसरे व्यक्ति को सौंपे जाने को लेकर विरोधाभासी बातें भी आईं। इन परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए हाईकोर्ट ने माना कि अभियोजन के सबूत आरोपियों को दोषी ठहराने के लिए पर्याप्त नहीं थे।
पवन उर्फ पोना ने जेल में बिताए 10 साल से ज्यादा
जाट आरक्षण आंदोलन से जुड़े इस मामले में पवन उर्फ पोना की लंबी जेल अवधि भी चर्चा में है। जगमार्ग की रिपोर्ट के मुताबिक, उसने 10 साल से अधिक समय जेल में बिताया। रिपोर्ट में उसके खिलाफ आंदोलन से जुड़े 23 मामलों का भी जिक्र किया गया है।
हाईकोर्ट से मिली राहत के बावजूद उसकी तत्काल रिहाई को लेकर कुछ कानूनी और जेल संबंधी औपचारिकताएं बाकी होने की बात रिपोर्ट में कही गई है। इसलिए सजा रद्द होने और जेल से वास्तविक रिहाई को अलग-अलग समझना जरूरी है।
अदालत के फैसले का क्या मतलब है?
हाईकोर्ट ने मिंटू हत्याकांड में तीनों की दोषसिद्धि और उम्रकैद की सजा रद्द कर दी तथा उन्हें इस मामले के आरोपों से बरी कर दिया। अदालत का फैसला अभियोजन के साक्ष्यों में पाई गई कमियों और आरोपों को संदेह से परे साबित न कर पाने पर आधारित है।
जाट आरक्षण आंदोलन के दौरान हुई हिंसा से जुड़े इस मामले में फैसला एक महत्वपूर्ण न्यायिक पड़ाव है। पवन उर्फ पोना के लिए यह लंबी कानूनी लड़ाई के बाद बड़ी राहत है, जबकि मामले में अदालत के फैसले और रिहाई की प्रक्रिया से जुड़ी आगे की स्थिति पर भी नजर रहेगी।






