मध्य प्रदेश में एक पूर्व जिला न्यायाधीश की अनिवार्य सेवानिवृत्ति का मामला फिर चर्चा में है। करीब आठ साल पहले पद से रिटायर किए गए न्यायाधीश आर.के. श्रीवास ने आरोप लगाया है कि उन्हें सेवानिवृत्त करने के लिए सेवा नियमों में बदलाव किया गया था। अब उन्होंने मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में इस फैसले को चुनौती दी है। अदालत ने मामले में न्याय मित्र नियुक्त किया है और अगली सुनवाई की तारीख भी तय की है। आखिर क्या है यह पूरा विवाद और जज ने नियमों को लेकर क्या सवाल उठाए हैं? आगे पढ़ें पूरी खबर।

आठ साल पुरानी अनिवार्य सेवानिवृत्ति को दी चुनौती
मध्य प्रदेश के जबलपुर में पूर्व जिला न्यायाधीश आर.के. श्रीवास की अनिवार्य सेवानिवृत्ति का मामला हाईकोर्ट पहुंच गया है। श्रीवास ने अपनी याचिका में आरोप लगाया है कि उन्हें निर्धारित सेवा नियमों के विपरीत अनिवार्य रूप से रिटायर किया गया था।
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की युगलपीठ ने मामले की सुनवाई के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता हेमंत श्रीवास्तव को न्याय मित्र नियुक्त किया है। न्याय मित्र का काम अदालत को मामले के कानूनी पहलुओं पर सहायता देना होता है।
वर्ष 2000 में न्यायिक सेवा में आए थे आर.के. श्रीवास
याचिका में बताया गया है कि आर.के. श्रीवास ने वर्ष 2000 में न्यायिक सेवा में प्रवेश किया था। उनकी वार्षिक गोपनीय रिपोर्ट यानी एसीआर में उन्हें बी और सी ग्रेड मिलने का उल्लेख है।
इसके बाद वर्ष 2016 में उन्हें उच्च न्यायिक सेवा में पदोन्नत कर जिला न्यायाधीश के प्रारंभिक स्तर पर नियुक्त किया गया। याचिका के मुताबिक, पदोन्नति के बाद करीब डेढ़ साल के दौरान उनका चार बार तबादला किया गया। उनके खिलाफ विभागीय जांच शुरू हुई और उन्हें निलंबित भी किया गया।
बाद में मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की फुल बेंच की सिफारिश पर अप्रैल 2018 में उन्हें अनिवार्य सेवानिवृत्ति दे दी गई।
सेवानिवृत्ति से पहले सेवा नियमों में बदलाव का आरोप
इस मामले का सबसे अहम पहलू सेवा नियमों में कथित बदलाव है। याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया है कि उनकी अनिवार्य सेवानिवृत्ति से करीब एक महीने पहले, मार्च 2018 में सेवा नियमों में संशोधन किया गया था।
याचिका के अनुसार, वर्ष 1994 के उच्च न्यायिक सेवा नियमों में बदलाव करके अनिवार्य सेवानिवृत्ति के लिए निर्धारित सेवा अवधि 20 साल से घटाकर 10 साल कर दी गई थी। 50 वर्ष की आयु संबंधी शर्त यथावत रखी गई थी।
श्रीवास का आरोप है कि यह संशोधन उन्हें अनिवार्य सेवानिवृत्ति देने के उद्देश्य से किया गया। उन्होंने अदालत में इस बदलाव और अपनी सेवानिवृत्ति की प्रक्रिया को चुनौती दी है।
ध्यान देने वाली बात यह है कि ये याचिकाकर्ता के आरोप और दलीलें हैं। हाईकोर्ट का अंतिम निर्णय अभी आना बाकी है।
सेवा अवधि और पात्रता को लेकर क्या है विवाद?
याचिका में मध्य प्रदेश उच्च न्यायिक सेवा (भर्ती और सेवा की शर्तें) नियम, 2017 के नियम 14 का भी उल्लेख किया गया है।
याचिकाकर्ता का तर्क है कि अनिवार्य सेवानिवृत्ति के लिए निर्धारित पात्रता और सेवा अवधि की सही तरीके से जांच की जानी चाहिए थी। उन्होंने यह सवाल भी उठाया कि निचली न्यायपालिका में बिताई गई सेवा अवधि को उच्च न्यायिक सेवा की अवधि के साथ जोड़कर किस आधार पर सेवानिवृत्ति का फैसला लिया गया।
उनका कहना है कि सेवा नियमों की लागू शर्तों और उनकी पात्रता को ध्यान में रखे बिना यह निर्णय लिया गया।
हाईकोर्ट ने न्याय मित्र नियुक्त किया, अब 16 नवंबर को सुनवाई
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की युगलपीठ ने मामले के कानूनी पहलुओं पर सहायता के लिए वरिष्ठ अधिवक्ता हेमंत श्रीवास्तव को न्याय मित्र नियुक्त किया है।
अब मामले में अगली सुनवाई 16 नवंबर 2026 को होगी। अदालत के सामने मुख्य सवाल यह है कि अनिवार्य सेवानिवृत्ति की प्रक्रिया में संबंधित सेवा नियमों का पालन हुआ था या नहीं और याचिकाकर्ता की दलीलों पर कानून के अनुसार क्या विचार किया जाना चाहिए।
फिलहाल, पूर्व न्यायाधीश की अनिवार्य सेवानिवृत्ति को लेकर लगाए गए आरोपों पर हाईकोर्ट का अंतिम फैसला नहीं आया है। अगली सुनवाई में मामले की आगे की दिशा स्पष्ट हो सकती है।






